अल्लाह ने क़ुर्आन में फ़रमाया कि, ऐ ईमान वालों तुम्हारे लिए रोज़े को ऐसे वाजिब किया गया है जैसे तुम से पहले वालों पर किया गया था,

ताकि तक़वा अपना सको। (सूरए बक़रह, आयत 183) रोज़ा शब्द का मतलब किसी भी चीज़ से अपने आप को रोकना, फ़िक़्ह की ज़बान में रोज़ेदार का अल्लाह के हुक्म से सुबह की अज़ान से मग़रिब की अज़ान तक रोज़ा बातिल करने वाली चीज़ों से दूरी बनाए रखने को कहते हैं।

रमज़ान रम्ज़ से बना है जिसके मायने है जलाना चुंकि ये महीना भी रोजादारों के गुनाहों को जला देता है इसलिये इसे रमज़ान कहा गया।
हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं कि जिसने रमज़ान पाया और अपनी बख्शिश ना करा सका वो हलाक हुआ मतलब ये कि अगर 11 महीनो में गुनाह होते हैं लेकिन अगर रमज़ानुल मुबारक मयस्सर आये तो उसकी ताज़ीम और उसका हक़ अदा करके अल्लाह को राज़ी किया जा सकता है। और अपनी बख्शिश कराई जा सकती है तो अब अगर किसी को रमज़ानुल मुबारक मिले और वो रोज़ा छोड़ता रहे नमाज़ क़ज़ा करे ज़कातो फ़ित्रा खुद खा जाये गुनाहों में पहले की तरह लगा रहे तो फिर उसके हलाक़ होने में क्या बाकी रहा ।

उक्त बातें सोशल मिडिया चैनल तालीमात ए इस्लाम चैनल के प्रभारी व मदरसा गौसिया फैजाने रजा हर पुर के के अध्यापक मौलाना क़ारी अताये रसूल आरिफ सिद्दीकी ने एक खास मुलाकात के दौरान किया ।
इतिहास में बहुस सारी दलीलों से यह बात साबित है कि रोज़े का हुक्म यहूदियों, ईसाईयों और भी दूसरे धर्मों में पाया जाता था, वह लोग दुख, मुसीबत, तौबा और अपने अल्लाह को राज़ी करने के लिए रोज़ा रखते थे, ताकि उसकी बारगाह में रोज़े के द्वारा अपनी परेशानी और विनम्रता को ज़ाहिर करते हुए अपने गुनाहों को स्वीकार कर सकें,

जैसा कि बाइबिल में है कि हज़रत मसीह ने 40 दिन रोज़े रखे थे। (तफ़सीरे नमूना, जिल्द 1, पेज 633) क़ुर्आन साफ़ साफ़ बयान करता है कि रोज़ा पिछली उम्मतों पर वाजिब था। (सूरए बक़रह, आयत 183) रोज़ा रखने के अनेक प्रकार के लाभ हैं, जिनमें से अहम यह हैं….
1. रोज़ा इंसान की रूह को पवित्र, इरादे और इच्छाशक्ति को मज़बूत करता है। (सूरए बक़रह, आयत 183)
2. रोज़ा फ़क़ीर और अमीर के फ़र्क़ को मिटाता है, ताकि लोग भूक और प्यास को महसूस करके फक़ीरों और ग़रीबों का ख़्याल रखें। (इस बारे में बहुत सी हदीसें हैं पढ़ने के लिए देखें, मन ला यहज़ोरोहुल फ़क़ीह, जिल्द 2, हदीस 1766-1769)
3. रोज़े द्वारा स्वास्थ्य और चिकित्सा के मामलों को भी सुधारा जा सकता है, और यह हमारी सेहत और फ़िटनेस का भी कारण है। (पैग़म्बर की हदीस है, रोज़ा रखो ताकि फ़िट रहो) रोज़ा एक इबादत है, और अल्लाह के इस हुक्म पर अमल करने के लिए सुबह की अज़ान से लेकर मग़रिब की अज़ान तक हर उस चीज़ से दूर रहना ज़रूरी है जो रोज़े को बातिल कर देती हैं, और यही रोज़े की नियत भी है। अगर कोई जान बूझ कर कोई ऐसा काम करे जिस से रोज़ा बातिल हो जाता हो तो उसका रोज़ा बातिल हो जाएगा, और उसको न केवल रमज़ान के बाद दोबारा रखना होगा बल्कि कफ़्फ़ारह भी देना होगा, और कफ़्फ़ारह यह है कि उसे हर एक रोज़े के बदले दो महीने रोज़े रखे जिसमें 31 लगातार रखने होंगे, या 60 फ़क़ीरों को खाना खिलाए या हर फ़क़ीर को 750 ग्राम गेहूँ या जौ दे, और गेहूँ या जौ की जगह पैसे देना उसी समय सही है जब यक़ीन हो कि वह इन पैसें से खाना ही ख़रीदेगा और इन पैसों को मराजेअ के दफ़्तर में भी दिया जा सकता है या उन्हें जिनको मराजेअ की ओर से अनुमति हासिल हो।

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