सेब-संतरा-नाशपाती की दुनियाभर में मांग घटी

दुनियाभर में फलों की पसंद और कारोबार का रुख अब तेजी से बदल रहा है. एक समय था जब सेब, संतरा और नाशपाती जैसे पारंपरिक फल एक्सपोर्ट में राज करते थे, लेकिन अब तस्वीर कुछ और है. राबोरिसर्च की नई “वर्ल्ड फ्रूट मैप रिपोर्ट” के अनुसार इन पारंपरिक फलों के निर्यात में पिछले कुछ सालों में गिरावट आई है, वहीं ब्लूबेरी, एवोकाडो और आम जैसे सुपरफ्रूट्स की मांग ने नया रिकॉर्ड बनाया है.

क्यों घटा सेब और संतरे का क्रेज?

रिपोर्ट बताती है कि मौसम में हो रहे बदलाव, खेती की बढ़ती लागत, ट्रांसपोर्ट में आ रही रुकावटें और लेबर की कमी जैसे कई कारणों ने पारंपरिक फलों को पीछे धकेल दिया है. यूरोप जैसे विकसित क्षेत्रों में फलों की कीमतें पिछले 5 सालों में लगभग 30 फीसदी तक बढ़ चुकी हैं. उत्पादन महंगा हो गया है, लेकिन ग्राहकों की जेब उतना साथ नहीं दे रही.

सुपरफ्रूट्स का जलवा बरकरार

बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, ब्लूबेरी और एवोकाडो जैसे हाई वैल्यू वाले सुपरफ्रूट्स की मांग अमेरिका और यूरोप में लगातार बनी हुई है. महंगाई हो या सप्लाई चेन की रुकावट इन फलों की पॉपुलैरिटी पर खास असर नहीं पड़ा. वहीं संतरे की जूस इंडस्ट्री बुरी तरह प्रभावित हुई है. 2020 से 2025 के बीच फ्रोजन ऑरेंज जूस की कीमतें 370 फीसदी तक बढ़ गईं. इसकी वजह ब्राजील और फ्लोरिडा में साइट्रस ग्रीनिंग नामक बीमारी और मौसम की मार रही.

कौन से देश बन रहे हैं नए फल एक्सपोर्टर?

अब फल कारोबार में कुछ नए खिलाड़ी उभर रहे हैं. मैक्सिको, पेरू और थाईलैंड जैसे देश सुपरफ्रूट्स के निर्यात में तेजी से आगे बढ़े हैं. मैक्सिको, जो 2013 में सातवें नंबर पर था, अब दूसरे नंबर पर पहुंच गया है. थाईलैंड ने ड्यूरियन जैसे स्थानीय फल से चीन के बाजार में बड़ी हिस्सेदारी बना ली है.

क्या होगा आगे का रास्ता?

फलों की वैश्विक मांग तो बनी रहेगी, लेकिन जलवायु संकट, श्रम की कमी, संसाधनों की लागत और राजनीतिक अस्थिरता से निपटना जरूरी होगा. विशेषज्ञों का कहना है कि आगे का रास्ता स्वचालित खेती, मौसम सुरक्षा और टिकाऊ तकनीक के बिना संभव नहीं.

भारत जैसे देश के लिए भी यह रिपोर्ट संकेत देती है कि अगर हम भविष्य के फलों की पहचान कर समय पर निवेश करें, तो ग्लोबल बाजार में अपनी हिस्सेदारी मजबूत कर सकते हैं. अब जरूरत है परंपरा से हटकर फलों की नई दुनिया को समझने और अपनाने की.

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