
भोपाल. शिवराज सिंह चौहान भले ही केंद्र में कृषि मंत्री की भूमिका में हों, लेकिन उनकी चालें, मुस्कानें और मुलाकातें साफ कह रही हैं कि उनका दिल अब भी मध्य प्रदेश की धरती के लिए धड़कता है। धड़के भी क्यों ना? जहां जन्म लिया, जहां से राजनीति का ककहरा सीखा और फिर 20 साल सत्ता के मुखिया रहे। दिल धड़कना तो लाजिमी है लेकिन आदिवासियों के हक की आवाज हो, किसान सभा हो या उनकी पदयात्रा… राजनीति के जानकार बताते हैं कि सीहोर से इंदौर तक उनकी मौजूदगी केवल सरकारी दौरे नहीं, बल्कि एक नई राजनीतिक पटकथा का संकेत लगती हैं।
प्रदेश की राजनीति को करीब से जानने वाले वरिष्ठ पत्रकार देवश्री माली कहते हैं कि मुख्यमंत्री मोहन यादव को शिवराज सिंह चौहान की ओर से कोई चुनौती आने की संभावना नहीं है। अगर हम बीजेपी का ट्रेंड देखें तो हमें यह बात समझ आ जाएगी। जब यह लोग शिवराज सिंह को लेकर आए थे, तब उमा भारती हर द्रष्टि से बहुत बड़ी नेता थीं। बाबूलाल गौर भी ठीक-ठाक पुराने नेता थे। लेकिन तब भी शिवराज को लेकर आया गया। इस बार भी ऐसा ही सीन है लेकिन शिवराज अब चरित्र अभिनेता के रूप में आ गए हैं। अब उनको आगे ही जाना है। हम 20 साल काम कर चुके नेता और पहली बार काम कर रहे नेता के बीच में तुलना करेंगे तो यह सही नहीं होगा
मोहन यादव को बीजेपी के पीढ़ी परिवर्तन सिद्दांत की वजह से सत्ता में लाया गया। रही बात शिवराज सिंह चौहान की सक्रियता की तो वह पार्टी के लिए फायदेमंद ही रहेगी। बीजेपी के मूल कैडर में न तो विद्रोह करने की क्षमता होती है और न उसकी इच्छा होती है। उन्हें पता होता है कि वह इसी संगठन से निकले हुए हैं। पार्टी भले ही शिवराज को राष्ट्रीय राजनीति में ले गई लेकिन वह मध्य प्रदेश में अपनी सियासी जड़ों को सामाजिक सराकारों के जरिए मजबूत करना चाहते हैं।
रिटायर्ड हर्ट नहीं होना चाहते हैं ‘मामा’
क्या ये एक संयोग है कि वे अपने पुराने गढ़ों में फिर से जनसंपर्क कर रहे हैं, या एक सुनियोजित वापसी की पटकथा? शिवराज की यह सक्रियता न केवल भाजपा के आंतरिक संतुलन को झकझोर रही है, बल्कि यह भी जता रही है कि मध्य प्रदेश की राजनीति से ‘मामा’ अभी रिटायर्ड हर्ट नहीं हुए हैं।
